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सोमवार, 23 नवंबर 2009

दृष्टिकोण

एक बोध - कथा है- वीरान जंगल में एक सुंदर मकान था। एक साधू ने उसे देखकर सोचा- कितना सुंदर स्थान है यह ! यहाँ बैठकर ईश्वर का ध्यान करूँगा। एक चोर ने देखा तो सोचा - वाह ! यह तो सुंदर स्थान है, चोरी का माल लाकर यहाँ रखूँगा। एक दुराचारी ने देखा तो सोचा - यह तो अत्यन्त एकांत स्थान है, दुराचार के लिए इससे उत्तम स्थान और कहाँ मिलेगा ? एक जुआरी ने देखकर सोचा - अपने साथियों को यहाँ लाऊंगा, यहाँ बैठकर हम जुआ खेलेंगे।
अलग - अलग दृष्टिकोण होने के कारण एक ही मकान को प्रत्येक व्यक्ति ने अलग - अलग रूप में देखा। इसलिए आवश्यकता है दृष्टिकोण बनाने की। जैसा दृष्टिकोण होगा, वैसा ही अंतःकरण होगा। फल भावना पर निर्भर है।

7 टिप्‍पणियां:

मोहसिन ने कहा…

आपने एकदम सही बात कही। जैसा दृष्टिकोण होगा, वैसा ही अंतःकरण होगा। रचना ज्ञानवर्धक है। बधाई।

शमीम ने कहा…

ब्लाग जगत में नया हूँ। आपकी रचना पढ़कर काफी अच्छा लगा। आगे भी ऐसी रचनाएं लिखा करें।

मनोज कुमार ने कहा…

विचारोत्तेजक!

बुझो तो जाने ने कहा…

फल भावना पर निर्भर है। - BAHUT sundar baat kahi gayi hai.EK Achi bodh katha.

Samya ने कहा…

मेरा भी यही विचार है।

डॉ.पदमजा शर्मा ने कहा…

हरिओम जी
'दृष्टिकोण 'की महता को अच्छी तरह से बताया है .

Babli ने कहा…

पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और टिपण्णी देने के लिए! मेरे इस ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा !बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है!